
दुर्गा सप्तशती, जिसे देवी महात्म्य या चंडी पाठ के नाम से भी जाना जाता है, मां दुर्गा की आराधना का सबसे पवित्र और शक्तिशाली ग्रंथ है। यह मार्कण्डेय पुराण से लिया गया एक दिव्य ग्रंथ है जिसमें 700 श्लोक हैं और 13 अध्याय हैं। इस पाठ में मां दुर्गा के तीन महान रूपों – महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की महिमा तथा असुरों के विनाश की कथाएं विस्तार से वर्णित हैं।
हिंदू धर्म में दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत शुभ, फलदायी और मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है। लेकिन इस पवित्र पाठ को करते समय सही समय, विधि और नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है। अन्यथा, पाठ का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता। आइए विस्तार से जानते हैं कि दुर्गा सप्तशती का पाठ किस समय, कैसे और किन नियमों के साथ करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती का पाठ किस समय करना चाहिए?
दुर्गा सप्तशती के पाठ का समय इसकी सफलता और फलप्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धार्मिक शास्त्रों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस पाठ के लिए कुछ विशेष समय सबसे उत्तम माने गए हैं।
सुबह का समय (सूर्योदय के बाद)
नवरात्रि के दौरान सुबह सूर्योदय के तुरंत बाद का समय दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। यह समय ब्रह्म मुहूर्त के बाद का होता है जब वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सर्वाधिक होता है। सुबह का पाठ मन को शांति प्रदान करता है और पूरे दिन के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
संध्याकाल (शाम का समय)
शाम के समय संध्याकाल में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना भी अत्यधिक फलदायी माना गया है। विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान संध्या का समय मां दुर्गा की आराधना के लिए सबसे उपयुक्त होता है। संध्याकाल में नव दुर्गाओं की ऊर्जा जागृत होती है और भक्तों की रक्षा करती है।
सामान्य दिनों में पाठ का समय
यदि आप नवरात्रि के अतिरिक्त सामान्य दिनों में भी दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहते हैं, तो शाम का समय सर्वोत्तम रहता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सामान्य दिनों में संध्याकाल में इस पाठ को करने से नव दुर्गाओं की ऊर्जा जागृत होती है और साधक को विशेष संरक्षण प्राप्त होता है।
ब्रह्म मुहूर्त में कुंजिका स्तोत्र
यदि आपके पास पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए समय नहीं है, तो ब्रह्म मुहूर्त में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत लाभदायक होता है। कुंजिका स्तोत्र को दुर्गा सप्तशती पाठ की चाबी माना जाता है और इसका पाठ करना पूर्ण सप्तशती पाठ के समान फलदायी माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त का समय सूर्योदय से लगभग 1 घंटा 36 मिनट पहले शुरू होता है और सूर्योदय से 48 मिनट पहले समाप्त हो जाता है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ किन विशेष अवसरों पर करना चाहिए?
नवरात्रि के दौरान
चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि दोनों ही दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए सबसे शुभ और फलदायी समय माने जाते हैं। इन नौ दिनों में किया गया पाठ विशेष फल प्रदान करता है। नवरात्रि में इस पाठ को “नवाह्निक पाठ” कहा जाता है, जिसमें 700 श्लोकों को नौ भागों में विभाजित करके प्रतिदिन पढ़ा जाता है।
गुप्त नवरात्रि
आषाढ़ और माघ मास की गुप्त नवरात्रि के दौरान भी दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। हालांकि इन नवरात्रियों में कलश स्थापना नहीं होती है, फिर भी मां दुर्गा का पाठ करना बेहद फलदायी होता है।
सप्ताह के विभिन्न दिनों में पाठ का फल
शास्त्रों के अनुसार, सप्ताह के प्रत्येक दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से अलग-अलग गुना फल की प्राप्ति होती है:
- रविवार: नौ गुना फल प्राप्त होता है
- सोमवार: एक हजार गुना फल मिलता है
- मंगलवार: सौ पाठ करने के बराबर पुण्य मिलता है
- बुधवार: एक लाख पाठ का फल प्राप्त होता है
- गुरुवार और शुक्रवार: दो लाख चंडी पाठ के बराबर फल मिलता है
- शनिवार: एक करोड़ चंडी पाठ के समान फल की प्राप्ति होती है
इस प्रकार शनिवार का दिन दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
दुर्गा सप्तशती पाठ करने की संपूर्ण विधि
दुर्गा सप्तशती का पाठ विधिपूर्वक करना अत्यंत आवश्यक है। शास्त्रों में बताई गई सही विधि का पालन करने से ही पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
पाठ की तैयारी
पाठ शुरू करने से पहले निम्नलिखित तैयारियां आवश्यक हैं:
- स्नान और शुद्धता: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान करके शुद्ध और स्वच्छ हो जाएं। पवित्र लाल वस्त्र या शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- पवित्र स्थान: घर के मंदिर में या किसी शांत, स्वच्छ और पवित्र स्थान पर बैठकर पाठ करें। जहां पाठ कर रहे हैं, वहां शुद्धता और शांति का वातावरण अवश्य होना चाहिए।
- आसन की व्यवस्था: लाल कपड़े का आसन, कुशासन या साफ कपड़ा बिछाकर उस पर बैठें। यह शुभ माना जाता है और पाठ में स्थिरता प्रदान करता है।
- पुस्तक की व्यवस्था: दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को हमेशा लाल कपड़े से ढककर रखें। पाठ के समय इसे लाल चुनरी से ढकी हुई चौकी पर रखें। हाथ में लेकर पाठ करने से अधूरा फल मिलता है।
कलश स्थापना और संकल्प
- देवी मां की प्रतिमा या चित्र के सामने कलश स्थापना करें।
- मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का ध्यान करें और नौ नामों का उच्चारण करें।
- तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर अपने पास रखें।
- हाथ जोड़कर मां दुर्गा को प्रणाम करें और संकल्प लें कि आप पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक पाठ करेंगे।
- जल से संकल्प छोड़ें और अपनी मनोकामनाओं को मन में रखते हुए पाठ का संकल्प लें।
पाठ से पहले आवश्यक स्तोत्र
दुर्गा सप्तशती के मुख्य अध्यायों का पाठ शुरू करने से पहले तीन महत्वपूर्ण स्तोत्रों का पाठ अनिवार्य माना गया है:
- देवी कवचम् (अथ देवी कवचं): कवच का पाठ सर्वप्रथम किया जाता है। यह साधक की सभी प्रकार की विघ्न-बाधाओं से रक्षा करता है। बिना कवच के पाठ करना रावण की भूल के समान माना गया है।
- अर्गला स्तोत्रम्: अर्गला स्तोत्र दुखों का अंत करता है और इच्छित फल प्राप्त करने का माध्यम है। जिसके हृदय में अर्गला होगा, वह अर्गलावान होगा।
- कीलक स्तोत्रम्: कीलक स्तोत्र फलदायक है और पाठ की गुप्त शक्ति को प्रकट करता है। यह पाठ की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इन तीनों स्तोत्रों के बिना दुर्गा सप्तशती का पाठ अधूरा माना जाता है और पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं होती। भगवान शिव ने स्वयं इन तीनों के महत्व को समझाया है।
मुख्य पाठ
तीनों स्तोत्रों के पाठ के बाद विनियोग मंत्र और शुद्धाचार के साथ सप्तशती के अध्यायों का क्रमवार पाठ शुरू करें। दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं जो तीन चरित्रों में विभाजित हैं:
प्रथम चरित्र (1 से 3 अध्याय)
इसमें महाकाली की महिमा और मधु-कैटभ असुरों के वध की कथा है। नवरात्रि में पहले तीन दिन इसका पाठ किया जाता है।
मध्यम चरित्र (4 से 10 अध्याय)
इसमें महालक्ष्मी की महिमा और महिषासुर वध की कथा वर्णित है। नवरात्रि के चौथे से छठे दिन तक इसका पाठ होता है।
उत्तर चरित्र (11 से 13 अध्याय)
इसमें महासरस्वती की महिमा तथा शुम्भ-निशुम्भ असुरों के वध की कथा है। नवरात्रि के सातवें से नौवें दिन तक इसका पाठ किया जाता है।
पाठ का समापन
- पाठ पूरा होने के बाद जल से पुनः संकल्प छोड़कर समापन करें।
- मां दुर्गा के नौ नामों का पुनः उच्चारण करें।
- देवी मां की आरती करें।
- क्षमा प्रार्थना अवश्य करें ताकि पाठ के दौरान हुई किसी भी भूल-चूक का दोष न लगे।
- पाठ को मां दुर्गा को समर्पित करें।
- आसन से उठने से पहले उसे थोड़ा मोड़कर उसके नीचे थोड़ा जल छिड़कें, तभी पाठ पूर्ण माना जाता है।
पाठ के विभिन्न प्रकार
एक दिवसीय पाठ: यदि आप एक ही दिन में संपूर्ण सप्तशती का पाठ करना चाहते हैं, तो एक ही आसन पर बैठकर सभी 13 अध्याय क्रमवार पढ़ें। इसमें लगभग 3 से 4 घंटे का समय लगता है।
नवाह्निक पाठ (नौ दिवसीय पाठ): नवरात्रि के नौ दिनों में तीन चरित्रों को विभाजित करके प्रतिदिन पाठ किया जाता है। यह सबसे प्रचलित और फलदायी विधि है।
नित्य पाठ: यदि आप प्रतिदिन संपूर्ण पाठ नहीं कर सकते, तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें जो पूर्ण सप्तशती पाठ के समान फलदायी माना जाता है।
दुर्गा सप्तशती पाठ के महत्वपूर्ण नियम
पाठ का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है:
पाठ के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें
- संकल्प की दृढ़ता: एक बार पाठ शुरू करने के बाद उसे पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प लें। अधूरा छोड़ना शुभ नहीं माना जाता।
- एकाग्रता और मौन: पाठ करते समय पूर्ण एकाग्रता बनाए रखें। मन और शरीर दोनों को शांत रखकर श्रद्धाभाव से पाठ करें। केवल मंत्रों का ही उच्चारण करें, अन्यथा मौन रहें।
- बीच में विराम नहीं: पाठ के बीच में बातचीत, मोबाइल फोन या किसी अन्य कार्य में ध्यान न भटकाएं। यदि अत्यंत आवश्यक हो तभी चतुर्थ अध्याय पूरा करने के बाद ही विराम लें।
- उच्चारण की शुद्धता: शब्दों का स्पष्ट, शुद्ध और लयबद्ध उच्चारण करें। उच्चारण न बहुत तेज होना चाहिए और न बहुत धीमा। गलत उच्चारण पाठ के प्रभाव को कम कर देता है।
- पाठ के दौरान न सोएं: पूर्ण जागरूकता के साथ पाठ करें। ध्यान रखें कि पाठ के दौरान नींद न आए।
- निरंतरता: जब भी पाठ करें, नियमितता बनाए रखें। अनियमित पाठ से पूर्ण फल नहीं मिलता।
आहार और आचरण संबंधी नियम
- सात्विक भोजन: पाठ के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन से पूर्णतया दूर रहें।
- ब्रह्मचर्य: पाठ के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें और शारीरिक पवित्रता बनाए रखें।
- नकारात्मक विचार न रखें: पाठ करते समय किसी के प्रति बुरे भाव या नकारात्मक विचार न रखें। मन को शुद्ध रखना अत्यंत आवश्यक है।
- पवित्र वस्त्र: लाल रंग के पवित्र वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
व्रत के साथ पाठ
यदि आप व्रत रखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। नवरात्रि में व्रत के साथ पाठ करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
दिशा का ध्यान
पाठ करते समय यदि संभव हो तो पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। यह शुभ और फलदायी माना जाता है।
धूप-दीप का प्रयोग
पाठ के दौरान देवी मां की मूर्ति या चित्र के सामने धूप-दीप अवश्य जलाएं। यह वातावरण को पवित्र बनाता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
दुर्गा सप्तशती पाठ का महत्व और लाभ
दुर्गा सप्तशती का पाठ करना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और साधना का मार्ग है। इसके अनगिनत लाभ हैं:
आध्यात्मिक लाभ
- मानसिक शांति: यह पाठ मन को शांति प्रदान करता है और आंतरिक सुख की प्राप्ति होती है।
- नकारात्मकता का नाश: जीवन से नकारात्मक शक्तियां, ऊर्जा और विचार दूर होते हैं।
- आत्मविश्वास में वृद्धि: साधक को आत्मबल और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।
- साधना में सिद्धि: नियमित पाठ से साधना में सफलता मिलती है और नव दुर्गाओं को सिद्ध किया जा सकता है।
भौतिक लाभ
- कठिनाइयों से मुक्ति: जीवन की सभी प्रकार की कठिनाइयां, संकट और परेशानियां दूर होती हैं।
- आर्थिक समृद्धि: आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।
- रोगों से मुक्ति: मानसिक और शारीरिक रोगों में लाभ मिलता है।
- सुख-समृद्धि: घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
- शत्रुओं का नाश: शत्रुओं से रक्षा होती है और उनका नाश होता है।
ग्रह दोष निवारण
दुर्गा सप्तशती का पाठ राहु-केतु की शांति के लिए भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। विभिन्न ग्रह दोषों का निवारण इस पाठ से होता है।
मनोकामना पूर्ति
श्रद्धा और विधिपूर्वक किया गया पाठ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है। मां दुर्गा की विशेष कृपा से भक्तों की हर इच्छा पूरी होती है।
विशेष सुझाव और सावधानियां
समय की कमी होने पर
यदि आपके पास संपूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए पर्याप्त समय नहीं है, तो निराश न हों। आप सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। यह दुर्गा सप्तशती की चाबी माना जाता है और इसे पढ़ने से संपूर्ण सप्तशती पाठ के बराबर फल मिलता है। इस स्तोत्र में मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन जैसे सभी उद्देश्यों की एक साथ पूर्ति होती है।
पहली बार पाठ करने वालों के लिए
यदि आप पहली बार दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं, तो किसी अनुभवी पुरोहित या ज्ञानी व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना उचित रहेगा। सही उच्चारण सीखने के लिए ऑडियो या वीडियो की सहायता भी ली जा सकती है।
गुरु का महत्व
यदि संभव हो तो किसी योग्य गुरु से दुर्गा सप्तशती की दीक्षा लेकर पाठ करना सर्वोत्तम माना जाता है। गुरु के मार्गदर्शन में किया गया पाठ अधिक प्रभावशाली होता है।
निरंतरता का महत्व
एक बार पाठ शुरू करने के बाद उसे निरंतर जारी रखना चाहिए। बीच में छोड़ना शुभ नहीं माना जाता। यदि किसी कारणवश एक दिन छूट जाए, तो उसे अगले दिन दोगुना करके पूरा करें।
पाठ का स्थान
घर में एक निश्चित स्थान चुनें जहां आप नियमित रूप से पाठ करेंगे। यह स्थान स्वच्छ, शांत और पवित्र होना चाहिए। यदि संभव हो तो यह स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में होना सबसे उत्तम है।
अन्य व्यक्तियों के साथ साझा न करें
दुर्गा सप्तशती के रहस्यों को अभक्तों के साथ साझा नहीं करना चाहिए। यह अत्यंत गोपनीय साधना है और इसे गुप्त रखना चाहिए।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का पाठ भारतीय धर्म और संस्कृति की एक अनमोल विरासत है। यह न केवल एक धार्मिक क्रिया है, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने, आत्मबल प्रदान करने और मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम है।
सही समय, उचित विधि और शुद्ध भावना से किया गया दुर्गा सप्तशती का पाठ जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता, सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। नवरात्रि में तो इसका विशेष महत्व है ही, लेकिन सामान्य दिनों में भी नियमित पाठ से अद्भुत परिणाम प्राप्त होते हैं।
याद रखें कि पाठ की सफलता केवल मंत्रोच्चारण में नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और पवित्र भावना में निहित है। मां दुर्गा की कृपा उन भक्तों पर सदैव बनी रहती है जो पूर्ण समर्पण और विधिपूर्वक उनकी आराधना करते हैं।
जय माता दी! जय दुर्गे!
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक ग्रंथों, पंचांगों और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी प्रदान करना है। किसी भी धार्मिक क्रिया को करने से पहले अपने विवेक या वशीकरण विशेषज्ञ और ज्योतिषी एस्ट्रो सलोनी से से परामर्श अवश्य लें।
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